क्या नोटबंदी सिर्फ़ ग़रीबों के लिए ही है?

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नोटबंदी हुए एक महिने से ज्यादा हो चुके हैं। 8 नवम्बर को जोहानसबर्ग में मैं अपने ऑफिस में बैठा था और अमेरिका में हुए इलेक्शन के रिजल्ट का इंतज़ार कर रहा था। मेरे दायें बैठा एक बंदा ट्रम्प के जीत की भविष्यवाणी कर रहा था और बाएं बैठा बंदा हिलेरी पर दाँव लगा रहा था। ये सब चल ही रहा था कि सोशल मीडिया पर मैंने कुछ और देखा। देखा की हमारे हिंदुस्तान में demonetization हो गया है, मतलब नोटबंदी। 500 और 1000 के नोट बंद कर दिए गए। हालाँकि इकोनॉमिक्स और करेंसी की समझ तो मेरी ज्यादा नही है लेकिन इतना लगा की अब जिन लोगों के पास ब्लैक मनी कॅश में होगी, उनका तो बंटाधार हो गया। कम से कम उन लोगों को तो सरकार पकड़ सकती है या उन बर्बाद हुए पैसे के बदले RBI नए नोट छाप कर अपने पास प्रॉफिट की तरह रख सकती है। अच्छा लगा सोच कर, ये पूरी बात मैंने अपने ऑफिस के अँगरेज़ लोगों को भी बताई और बताया कि हमारे देश की सरकार कितनी सक्षम है और कितना अच्छा काम कर रही है। मेरे पास भी 500 और 1000 के कुछ नोट थे, जिसके बर्बाद होने का दुःख नही था।

 

काले धन के अलावा आतंकवाद और फेक करेंसी इंडस्ट्री भी इससे टूट जायेगी, ऐसा माना गया था। कदम अच्छा था और इसकी हर जगह वाहवाहि भी हुई थी। लेकिन मुझे खुद इंडिया आये करीब 10 दिन हो चुके हैं और नोटबंदी हुए एक महीने से ऊपर बीत चुके हैं, लेकिन इसके परिणाम और असर कुछ और ही कहानी कहते हैं। ATM में लगी कतारें अब भी वैसी ही हैं। कई बंद पड़े हैं तो कई में हफ्ते में सिर्फ एक दिन, सोमवार को, ही पैसे होते हैं। 100 से ज्यादा लोग इन सब कारणों से मर चुके हैं, और आप मानिये या न मानिये, ये मौतें असली है। बैंक के बाहर जहाँ आम इंसान धूप या ठण्ड में लाइन लगा खड़ा है, वहीँ कई ऐसे बैंक मैनेजर और कर्मचारी है, जो कमिशन ले कर, पिछले दरवाजे से ब्लैक को व्हाइट कर रहे हैं। कुछ ऐसे लोग भी हैं जिन्होंने 10 लाख से लेकर 4 करोड़ तक ब्लैक को वाइट किया है, और मुझे पूरा भरोसा है कि आपके भी सर्किल में ऐसे लोग होंगे या उनके बारे में आपने भी सुना होगा। हर दिन करोड़ो के नोट पकडे जा रहे हैं। हिंदुस्तान के हर कोने में ये गोरखधंधा चल रहा है। जहाँ आतंकवादियों के पास भी नए 2000 के नोट निकल रहे हैं, वहीँ 2000 के जाली नोट भी बाजार में आ चुके हैं। अभी हाल में ही 2000 के करोड़ों के जाली नोट पुलिस ने जब्त भी किये हैं और कुछ लोगों को गिरफ्तार भी किया है।

कितनी ब्लैक मनी सरकार को मिलेगी ये तो पता नही लेकिन लोगों का सारा ब्लैक 500 या 1000 की जगह अब 2000 के नोटों में अब भी या तो उनके पास है या बैंक्स में आराम से जमा है। सरकार ने अपनी वाहवाही जारी रखी है, पहले वो कालाधन पर सर्जिकल स्ट्राइक कहती थी और अब उसे कैशलेस इकॉनमी के नाम से रंग कर लोगों को परोस रही है। कुल मिलाकर आप और हम लाइन में लगे रहेंगे और लोग 10,000 करोड़ की शादी कर के प्राइवेट जेट से निकल लेंगे।

 

कई सेक्टर में धंधा धीमा हो गया है। लोग काम नही करवा पा रहे क्योंकि नोट नही है और जो बैंक में है, उनके निकालने पर लिमिट है। तो जब काम नही होगा तो जो ऐसे मजदूर है, जो हर दिन कमाते हैं ताकि उनका परिवार चल सके (जिन्हें Paytm नही पता, और जिन्हें कोई बैंक या कंपनी क्रेडिट कार्ड नही देती), आखिर वो लोग जाएँ तो जाएँ कहाँ, कहाँ जाएँ, क्या कमाएं, क्या खाएं। ये उन जैसे लोगों के लिए संकट ले कर आया है। हमारे हिंदुस्तान में 86% आज भी कैश में ही लेनदेन होता है, इसलिए जब कैशलेस इकॉनमी का नारा सुनने पर नाचने का मन करे न, तो थोड़ा रुक जायेगा, एक मिनट ये सोचियेगा की जो मजदूर आपका घर बना रहा, जो बाई आपके यहाँ काम कर रही, जिसके यहाँ आप अपने टूटे हुए जूते, चप्पल, छाते, घड़ी या कुछ और बनवाने जाते हैं, उनको भी आप क्रेडिट कार्ड से ही अगर पेमेंट करेंगे क्या। नारे होते ही हैं जोश में लाकर होश भुलाने को, इनसे बचिए। वैसे मेरे पास वो 1000 और 500 के नोट अब भी पड़े हैं। अगर बदलवाने बैंक जाऊं तो एक दिन की छुट्टी ले कर जानी पड़ेगी, और एक दिन की तनख्वाह बचाऊ तो फिर ये नोट नही बचा पाउँगा।

बाकि रविश कुमार के शब्दों में, बाकि जो है, सो तो हइये है।

 

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मोहम्मद की रामलीला

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एक कहानी सुनाता हूँ आज आपको. एक बच्चे की कहानी. 10 साल का एक लड़का, एक छोटे से शहर का रहनेवाला. पढाई में ज्यादा तेज नही था, लेकिन बाकि चीजों में सबसे आगे. अपने शहर में होनेवाले हर नाटक, नौटंकी में पार्ट लेता और ऐसा जबरदस्त एक्टिंग करता की देखने वाले वाह-वाह कर बैठते. धीरे-धीरे उसका नाम उस छोटे से शहर से निकल कर बड़े शहरों में होने लगा, फिर पूरे देश में। लोग उसके अभिनय का लोहा मानने लगे. वो पतला सा सांवले रंग का लड़का इतना मशहूर हो गया की शहर-शहर घूम कर नाटक करने लगा. हर तरह के नाटक किये, कभी अमीर बन जाता, कभी गरीब बन जाता, किसी नाटक में विलन बन जाता तो किसी में हीरो. वो लड़का खुश था अपने काम से, अपने पड़ोसियों से, अपने दोस्तों से.

फिर एक दिन उसे एक रामलीला में एक्टिंग करने का मौका मिला। निभाना था उसे राम का किरदार। एक चुनौती थी उसके सामने राम बनकर लोगों के सामने जाने का, और उनके दिलों में उतर जाने का। रोल मुश्किल था लेकिन वो भी कहाँ हार मानने वाला था। उसने एक महीने पहले से रिहर्सल शुरू कर दी। अपने डायलॉग्स याद करने लगा, अपने इमोशन्स को सवांरने लगा। एक महीना ऐसे ही बीत गया और इस वक़्त उसने अपने आप को राम के किरदार के लिए ढाल लिया। राम और रामायण की कहानी उसने बचपन से सुन रखी थी, और आज उसे खुद राम बनने का मौका मिला था।

स्टेज तैयार था और राम की एंट्री होने ही वाली थी की तभी कुछ शोर हुआ। पता चला कुछ धर्म के ठेकेदार आये हैं और अपने को रामभक्त तो कहते हैं लेकिन रामलीला रुकवाने आये हैं.
“बंद करो, बंद करो, ये रामलीला बंद करो,”
किसी ने पूछा, “कौन हो भाई तुमलोग?”
“हम हैं जनता के सेवक।” शोर ने शोर किया।
“कहाँ से आये हो?”
“दिल्ली से।”
“क्या चाहते हो?”
“हम ये रामलीला रोकने आये हैं।”
“मगर क्यों, तुम्हारा राम से क्या बैर?”
“बैर राम से नही है, लेकिन एक मुसलमान राम नही बन सकता.”

“और क्या ये खुद श्रीराम कह कर गए हैं?”

“फालतू बातों के लिए हमारे पास वक़्त नही है, बंद करो ये रामलीला.”

“लेकिन राम ने तो…..”

समाज शराफत से कहता रहा लेकिन ठेकेदार तो ठेकेदार ठहरे. रामलीला रुकवा दी गयी. राम के कपडे पहने मोहम्मद से कपडे उतरवा लिए गए. एक कलाकार को नंगा कर दिया गया. लेकिन दरअसल नंगा कलाकार नही हुआ था, नंगा समाज हुआ था, ठेकेदारों के हाथों.

रामलीला किसी धर्म से ज्यादा अपने समाज का प्रतीक है. डायलॉग्स भले राम के हो, लेकिन माइक टेस्टिंग कोई इरफ़ान या गुलाम ही कर के देता है. कपडे सीता के हो लेकिन वो किसी इम्तियाज़ या रहमान टेलर मास्टर के हाथों ही सिल कर निकलते हैं. प्रसाद भले राम का हो, जिन बर्तनों में वो बनता है, वो किसी अजहर या शमीम कैटरिंग वाले के यहाँ से ही आते हैं.

नवाजुद्दीन सिद्दीकी कोई मुसलमान नही है. वो हमारा पडोसी है. कहीं पाकिस्तान में वो रामलीला नही कर रहे थे, उनका अपना घर था बुधना, जहाँ वो पले-बढे हैं, जहाँ की मिटटी की ऐसी खुशबू है की उनका बचपन से सपना था रामायण में मारीच बनने का. एक कलाकार को आपने सरेआम तमाचा मारा है, एक बच्चे के बचपन का सपना तोडा है.

मुझे पता है आप राम को नही जानते, न उनके बारे में पढ़ा है, नही तो जिस राम की रामलीला आप रुकवा रहे हैं, ये वही राम है जिहोने शबरी के जूठे बेर खाए थे, ये वही राम है जिन्होंने रावण के सामने अपना सर झुका कर उनसे आशीर्वाद माँगा था, ये वही राम हैं जिन्होंने अपने वनवास का दोषी न किसी को ठहराया न किसी से बदला ही लेने का सोचा. आज राम होते तो नवाज को गले लगा लेते, और लक्ष्मण के समकक्ष उनको खड़ा करके भाई बना लिया होता. अच्छा हुआ आज राम नही है, नही तो क्या पता, ये धर्म के ठेकेदार आज उनको फिर किसी और वनवास पर भेज दिए होते.

 

बहन रूबी, जेल तो हमें जाना चाहिये.

मेरी छोटी बहन रूबी, ये चिट्ठी मैं तुम्हारे नाम लिख रहा हूँ. तुम मुझे जानती नही हो, लेकिन सारे रिश्ते क्या खून के ही होते हैं. कभी-कभी कुछ रिश्ते ऐसे ही बन जाते हैं, बनाने नही पड़ते.
पहली बार तुम्हारा इंटरव्यू देखा था टीवी पर, जब तुम अपने सब्जेक्ट्स के नाम सही से नही बता पायी थी. कई लोगों ने उस इंटरव्यू को देखा, बार-बार देखा, सबको दिखाया और ठहाके लगाये.
मगर जब मैंने तुम्हे उस विडियो में देखा, तो मेरा यकीन मानो, मुझे ज़रा भी हँसी नही आई, बल्कि मुझे दुःख हुआ. थोडा दुःख तुम्हे देख कर हुआ, और थोडा अपने इस शिक्षा व्यवस्था या एजुकेशन सिस्टम को देख कर हुआ.

उसके बाद जिस तरह से पूरे देश के मीडिया ने तुम्हारे चेहरे को प्राइम टाइम में सिर्फ TRP के लिए इस्तेमाल किया, वो तो और भी शर्मनाक है. किसी ने ये नही सोचा की तुम भी किसी की बहन होगी, बेटी होगी, किसी की दोस्त होगी. इस तरह से मीडिया ट्रायल चला कर तुम्हारी और तुम्हारे माँ, बाबूजी, परिवार के इज्जत की धज्जियाँ उड़ाई गयी. मै पूछता हूँ इन मीडिया वालों से की आखिर तुम्हारा कसूर क्या था. क्या तुमने किसी का खून किया था, क्या तुमने किसी को बम से उड़ाया था या फिर तुमने हिन्दू-मुसलमान के दंगे प्लान किये थे. और ये मीडिया वाले किसानों की आत्महत्या और भूखमरी क्यूँ नही दिखाते, क्यूँ नही दिखाते जब गुजरात में भी नक़ल की खबरें आती है. क्या बिहार को छोड़कर पुरे देश में राम राज्य है क्या. तुम्हे बताता हूँ ये मीडिया बस खबरें बेचने लगी है आजकल, खबरें दिखाना इनका काम नही रहा अब. तुम इन्हें भले माफ़ कर दो, लेकिन मैं इन्हें कभी नही माफ़ कर पाउँगा.

फिर तुम्हे फेसबुक और whatsapp जोक्स का शिकार बनाया गया. मै पूछता हूँ इन सोशल मीडिया पर बकैती करने वालों से की क्या तुम्हारे घर में भी किसी के साथ ऐसा होता तो क्या तब भी तुम ऐसा ही करते. और ये जोक्स बनाने और फॉरवर्ड करने वाले कोई बाहर के लोग नही हैं, ये वही तुम्हारे बिहारी भाई-बहन हैं जो दिल्ली-मुंबई में एक रूम की खोली ले कर रहते हैं और 5000 के मोबाइल में 50 रुपैये का डाटा पैक भरवा के अपने को महान क्रांतिकारी समझते हैं. कभी तुम इनसे मिलो तो पूछना की भैया आप तो पढ़ के बाहर चले गए अच्छी नौकरी ढूँढने, काश मुझे भी अपने साथ ले जाते तो ये दिन न देखना पड़ता, फिर मै भी स्टीफेंस और मिरांडा हाउस जैसे कॉलेज में पढ़ पाती. फिर शायद उन दीदी जैसा बन पाती, जो आज फाइटर प्लेन उड़ाने वाली पहली भारतीय महिलाओं में शामिल हुई हैं.

लेकिन सबसे ज्यादा दुःख मुझे तब हुआ जब तुम्हे जेल भेज दिया गया. की क्या हमारी सरकार अंधी हो गयी है या पुलिस वाले बेकार बैठे हैं. किस जुर्म में तुम्हे जेल भेजा गया, मुझे बताए कोई. मुझे पूरा यकीन है की शायद ही तुम्हे घर में 500 रुपैये से ज्यादा मंथली पॉकेट मनी मिलती होगी, फिर तुमने भला कहाँ से 15-20 लाख रुपैये दिए होंगे. अगर तुम्हारे बाबूजी ने ये रुपैये दिए हैं, तो जेल उनको जाना चाहिए. और उनको अकेला भला क्यूँ, ये जो कॉलेज के प्रिंसिपल हैं, विश्वविध्यालय के प्रोफेसर हैं, किरानी है, चपरासी है, और जो-जो लोग इन सब में शामिल हैं, पहले उन्हें जेल भेजना चाहिए. तुम तो इस भ्रष्ट सिस्टम की बस विक्टिम हो, शिकार हो, गुनाहगार नही हो. गुनाहकार तो वो है जो दशकों से इस खेल को राजनीतिक संरक्षण और पैसे के दम पर खेलते आ रहे हैं. कोई उन्हें जेल क्यूँ नही भेजता. क्यूँ तुम्हे जल्दबाजी में रिमांड होम की जगह सीधे जेल भेज दिया गया, किसी को बलि का बकरा बनाने की इतनी जल्दबाजी थी क्या. क्यूँ सरकार के शिक्षा मंत्री नैतिक स्तर पर जिम्मेदारी लेते हुए इस्तीफा नही देते, क्या नैतिकता की शिक्षा उन्हें नही मिली है क्या. जिस तरह से तुम्हे इमोशनल टार्चर का सामना करना पड़ रहा होगा, उसकी कोई भरपाई करेगा क्या.

रूबी, मेरी बहन, तुम बस इस भ्रष्ट सिस्टम का शिकार हुई हो. तुम गुनाहगार नही हो, तुम बेक़सूर हो, और ये बात हमेशा याद रखना, क्यूंकि गुनाहगार तो हम हैं, हमारी शिक्षा व्यवस्था में बैठे वो लोग हैं, जिन्होंने सरस्वती के मंदिर को, लक्ष्मी का मंदिर बना, सरस्वती को सड़क पर धकेल दिया है. जेल तो हमें जाना चाहिए. आज भले तुम्हारे साथ ज्यादती हो रही है, लेकिन वो दिन भी आएगा जब ये शिक्षा के व्यापारी जेल जायेंगे और तुम्हे इन्साफ मिलेगा, इस एजुकेशन सिस्टम को इन्साफ मिलेगा. जब तुम्हारी तरह गाँव में रहने वाली मेरी और बहनें पढ़ेंगी और देश में अलग-अलग ऊँचा मुकाम हासिल करेंगी. वो दिन आएगा, जरुर आएगा, ये एक भाई का तुमसे वादा है.

इरफ़ान, तुमको याद रक्खेंगे गुरु हम

कुछ सही से याद तो नही आ रहा, लेकिन कॉलेज के ज़माने की ही बात है, ऐसा धुंधला सा याद आ रहा. मूवी चल रही थी और जब-जब वो शख्स स्क्रीन पर आता था न, एक जोश पैदा कर देता था. हॉस्टल के १० लौंडे, एक पढ़ाकू लौंडे के रूम में बड़े स्क्रीन वाले मॉनिटर पर मूवी लगा के, खिड़कियाँ बंद करके, अँधेरा कर के, सिनेमा हॉल जैसा माहौल बनाये बैठे थे. था वो विलन ही, माने खलनायक, लेकिन हीरो माफिक नज़र आता था. वो मूवी ख़त्म हुई और हम उसके फैन बन गए, सारे डायलॉग्स जबानी रट लिए, विकिपीडिया पढ़ लिया और अपने फेवरेट एक्टर्स की लिस्ट में उसका नाम डाल दिये. मूवी थी हासिल और एक्टर थे इरफ़ान खान.

“मारे लप्पड़ तुम्हारी बुद्धि खुल जाये…अबे तुमलोग गुरिल्ला हो, गुरिल्ला-उरिल्ला पढ़े हो की नही….वो साले गुंडे हैं, हम क्रांतिकारी……गुरिल्ला वार किया जायेगा…..”

“और जान से मार देना बेटा, हम रह गए न, मारने में देर नही लगायेंगे….”

ऐसी ही कई धाँसू डायलॉग्स से लैस जब मूवी ख़तम हुई न, तो बॉस, हम तो फैन बन चुके थे इरफ़ान के. उसके बाद तो कई मूवीज आई और हमारा और इरफ़ान का रिश्ता और गहरा होता गया.

लेकिन ये तो थी रील लाइफ. अब आते हैं रियल लाइफ पर. अभी 2-3 दिन पहले इरफ़ान ने रमज़ान में होने वाले क़ुरबानी पर सवाल उठाया था. हालाँकि उनका कहना उनकी तरफ से जायज़ भी था, लेकिन अब लॉजिकल बात सुनता कौन है.
मौलवियों ने कह दिया की इरफ़ान एक्टर हैं, एक्टिंग करें, धरम के मामले में दखल न दें. अब ये कौन सी बिना सर पैर वाली बात हुई. मतलब क्या अल्लाह ने इरफ़ान के बोलने का अधिकार ख़तम कर दिया, सिर्फ इसलिए की वो एक्टर बन गए.

अब ये मौलवियों को कौन समझाए, जिन्हें धरम के नाम पर ही इज्जत, शोहरत और पैसे मिलते हैं. फिर आज इरफ़ान ने सवाल उठाये की आखिर बांग्लादेश में ISIS के हमले के बाद, सारे मुसलमान इसके खिलाफ क्यूँ नही खड़े होते, क्यूँ नही लोगों को बताते हैं, की सच्चा इस्लाम क्या है, वो क्या सीखाता है. अब इस जगह भी इरफ़ान सही है जो चाहते हैं की सभी मुसलमान एक हो कर अपने खिलाफ बन रही गलत धारणा का विरोध करें.

अब इस मसले पर भी कई लोग उनके साथ होंगे, तो कई लोग उनके खिलाफ. आप सहमत भी हो सकते हैं, असहमत भी. वो मुद्दा नही है, वो तो ठीक बात है. लेकिन मुझे ख़ुशी है की इरफ़ान बोलते हैं. जो उनके दिल को सच्चा लगता है, वो बेबाक कह देते हैं. वो उन अन्य फ़िल्मी हस्तियों जैसे नही हैं, जिन्हें अपने काम और अपने AC रूम को छोड़कर, शायद ही हिन्दुस्तान में हो रही और बातों से सरोकार होता है. वो जानते होंगे, सुनते होंगे, और अफ़सोस भी करते होंगे, पर जनाब कुछ कहते क्यूँ नही. आपके पास मास फैन फोलोविंग है, अपनी आवाज पहुँचाने का तरीका है. आपके बस बोल देने से धारणाएं बदल सकती है, लोग बदल सकते हैं, पर आप ऐसा करते नही है. क्यूंकि आपमें जिगरा नही है. आप अपनी मूवी की कमाई को किसी भी एंगल से कम होते देखना नही चाहते. आप controversy में पड़ना नही चाहते.

लेकिन अपने पान सिंह तोमर ने ये कर के दिखाया है. इसलिए तो मुझे आज भी ख़ुशी है की मैंने गलत इंसान को अपनी फेवरेट लिस्ट में नही डाला है. आज अगर इरफ़ान हमसे न भी पूछें न तो हम पान सिंह तोमर की गैंग में शामिल में हो जाएँ. इरफ़ान ये तुम्हारे लिए, तुम्हारी ही मूवी हासिल का एक डायलॉग: “तुमको याद रक्खेंगे गुरु हम.”

 

नोट: ये लेख यूथ की आवाज में भी छाप चुकी है. जिसका लिंक नीचे रहा:

क्यूँ इरफ़ान खान का रील और रियल लाइफ का अंदाज़ उन्हें मेरा पसंदीदा एक्टर बनाता है

सुनो ऊँची जाती वालों! पागल हम हैं की तुम इ बताओ

हाँ तो तुम क्या कह रहे थे, की तुम ऊँची जाती के हो? ह्म्म्मम्म.
अच्छा, ठीक है ये बताओ, की ये ऊँची जाती होने का सर्टिफिकेट कहाँ से लिया. हाँ मतलब किसने कहा की फलाना जाती ऊँची रहेगी और फलाना जाती नीची रहेगी. हाँ बताओ ज़रा.
अब बकलोल जैसा मेरा मुँह मत ताको, जवाब दो. कहाँ लिखा है, कौन से वेद में, पुराण में, या गीता में, महाभारत में, या कुराण में.
अजी हमने भी पढ़ा है, श्रीकृष्ण ने गीता में पुरा मोक्ष पाने का और उनतक पहुँचने का रास्ता स्टेप बाई स्टेप लिखा है, लेकिन कहीं ये नही लिखा की ये ऊँची जाती के लिए है और ये नीची जाती के लिए है.

चलो कोई एक कारन बता दो जिससे हम मान ले की तुम चूँकि ऊँची जाती के हो इसलिए ऐसा करते हो या इसलिए तुम्हारे साथ ऐसा होता है.
चलो इ बताओ अभी के अभी अगर पानी बरसने लगे, और बिना छत्ता के तुम भी खड़े हो और हम भी खड़े हैं, तो खाली हम ही भींगेंगे, तुम नही भीगोगे का?
अच्छा तुम भी भीगोगे? ठीक है.
अच्छा सोचो यहाँ अभी एकदम पगलवा टाइप धूप हो जाये तो गर्मी खाली हमको लगेगा या तुमको भी लगेगा?
अच्छा तुमको भी लगेगा? ठीक है.
एगो लास्ट बात और बताओ, अगर हम दुन्नो साथे ही आग में कूद जाते हैं, तो खाली हम ही जलेंगे की तुम भी जलोगे.
अच्छा तुम भी जलोगे, बढ़िया बात.
नही-नही पगलाए नही हैं हम. तुमको तुम्हारे ही जबान में सोचे समझा देते हैं, की आगे से तुम ऊँच और नीच जाती नही करेगा.

अब सुनो ससुरे गौर से, जब आग भी तुमको उतना ही जलाता है जितना हमको, जब धूप भी तुमको उतना ही गर्मी देता है, जितना हमको और जब पानी भी तुमको उतना ही भिगाता है, जितना हमको, तो ससुरे तुम काहे के ऊँच जात और हम काहे के नीच जात बे. इ समझाओ हमको. और इ बताओ की ससुरा हम पागल की तुम पागल. हम इ सब बात रिजर्वेशन लेने के लिए नही कर रहे समझा. और न ही कल हमको मंडल-कमंडल हल्ला कर-कर के नेता ही बनना है. हम जा रहे हैं, सरहद पर, देस का सेवा करने. वहाँ कोनो ठिकाना नही है, मर-मुरा जायेंगे. तो जब तिरंगा में लिपटल आयेंगे न अपना घर, तो ससुरे चिता जलने देना कम से कम. हल्ला मत करना की ऊँची जाती के ज़मीन पर नीची जाती का चिता नही जलने देंगे. हमको अपना चिंता नही है, कम से कम जो बेसहारा बाल-बच्चा को छोड़ जायेंगे न, उनके सामने ऐसा मत कर देना की उ लोग भी सोचने लगे की उसका बाप सैनिक पहले था या नीची जाती वाला पहले. चलो अब चलते हैं. कश्मीर जा रहे हैं, १०-२० ससुर के नाती को तो जन्नत पहुंचाए के ही लौटेंगे अगली बार छुट्टी में. जय हिन्द. भारत माता की जय. तुम लोग सुतो आराम से बे, हम हैं न, पाकिस्तान और चाइना को तो हम अकेले ही सीना पर गोली मार कर और खा कर संभल लेंगे.

नोट: ये कहानी भारत माता के वीर सपूत वीर सिंह को समर्पित है, जो कश्मीर में ड्यूटी निभाते-निभाते शहीद हो गए.

सोना हमें माफ़ कर दो, क्यूँकी हम बेशरम हो चुके हैं.

सोना हमें माफ़ कर दो, क्यूँकी हम बेशरम हो चुके हैं.

सोना मोहपात्रा, मैं ये माफ़ीनामा आपके और आपके जैसे उन सभी लोगों के नाम लिख रहा हूँ, जो सिर्फ सच को सच बोलने के लिए ऑनलाइन या ऑफलाइन गुंडेबाज़ी का शिकार हो रहे हैं. उन सभी लोगों के नाम जिन्हें या तो सरेआम या इनबॉक्स कर के गालियाँ दी जाती है, डराया जाता है या धमकाया जाता है.

जब इस देश में सरहदों के साथ-साथ, देश के अन्दर भी हमारी जान बचाने के लिए सैनिक अपनी जान दिए जा रहे हैं, गाँव में महिलाओं का निर्दयता से बलात्कार कर दिया जा रहा है, बुंदेलखंड में किसान भूखे हैं, विदर्भ में आत्महत्याएं हो रही है, हमारा खून नही खौल रहा है. खून खौल रहा है तो आप पर की आपने हमारे देवता समान भाई को गलत कैसे ठहरा दिया. आपने ऐसा सोच भी कैसे लिया की सलमान खान, जो फ़रिश्ते के बन्दे हैं, उनको उनके फैन्स के सामने आप दोषी ठहरा सकती हैं. और तो और, ऊपर से एक औरत हो कर, जिस औरत को हमने आज भी पाँव तले दबा के रखा है, जिसे कभी दहेज़ के नाम पर खुलेआम जला देते हैं, तो कभी स्लट का तमगा देकर अपने मर्द होने का सबूत देते हैं, उसने बोलने की हिम्मत की भी तो कैसे.

sona

हम आपसे माफ़ी इसलिए माँग रहे हैं की हमें लगता है की अब शर्म हममे बची ही नही है. हम जानवर से इंसान बने थे, लेकिन इंसान से अब हैवान बनते जा रहे हैं, या लगभग बन चुके हैं. कई मामलों में काने तो हम पहले से थे, लेकिन अब धीरे-धीरे अँधे, बहरे और गूँगे बनते जा रहे हैं. अँधे इसलिए की कुछ सच्चाई हमें दिखाई नही देती, और कुछ हम देखना नही चाहते, बहरे इसलिए क्यूँकी अपने मतलब की बात छोड़ हमें और कुछ सुनाई नही देता और गूँगे इसलिए क्यूँकी जहाँ बोलना है वहां हम बोल नही पाते, भले कभी आप जैसे लोगों को जी भर कर माँ-बहन की गालियाँ दे ले. दरअसल हम बिलकुल ढोंगी हो चुके हैं. जहाँ दुर्गा, सरस्वती और लक्ष्मी के आगे सर झुकाते हैं, वहीँ सोना, सोनम या पूजा के इज्जत की धज्जियाँ सडकों, गलियों के साथ-साथ फेसबुक, ट्विटर पर उड़ा कर अपनी मर्दानगी दिखाते हैं. हम हिन्दू भी हैं, और मुसलमान भी है, बस इन्सान अब नही हैं. कहीं हमारा खून तो पानी नही हो गया है? लेकिन अगर खून पानी हो जाता तो किसी भी बात पर नही खौलता. मुझे तो कभी-कभी लगता है की इस खून में शायद जहर भर गया है, क्यूँकी हम जब भी बोलते हैं, जहर ही उगलते हैं.

हमें लगता है की अब हम कायर हो चुके हैं. मोबाइल के टच स्क्रीन और कंप्यूटर के कीबोर्ड के पीछे छुपकर दिन भर लोगों को गालियाँ देते फिरना भला कहाँ की बहादुरी है, लेकिन चूँकि हम बेशर्म, बेहया है, ये बात हम मान नही सकते. आपने जो कहा, सही कहा और इस बात पर मुझे फ़क्र है की आप आज भी उसी हिम्मत से अकेले लड़ रही है, जिस हिम्मत से पहले दिन लड़ा था. बस एक गुजारिश है की आप झुकना मत. क्यूँकी अगर आप जैसे लोग भी झुक गए, तो हम जैसे कायरों, बुजदिलों का हौसला और बढ़ जायेगा, जो शायद समाज में और जहर घोलेगा. आप हिम्मत मत हारना, क्यूँकी हो सकता है की आपकी हिम्मत देख कर हम जैसों में थोड़ी शर्म वापस आ जाये, फिर से शायद हम जैसे अँधे देखने लायक हो जाये, बहरे सुनने लायक और गूँगे बोलने लायक हो जाएँ. हमें माफ़ कर देना सोना, क्यूँकी हम बेवकूफ तो पहले से ही थे, अब बेशरम भी होते जा रहे हैं.

योगा का अंतिम आसन – दालासन

दिल्ली की सड़कें नए-नए योगियों से पट चुकी थी. हर तरफ कई तरह के आसन कर रहे लोग चटाई बिछा-बिछा कर अपनी योग विद्या का प्रदर्शन कर रहे थे. इन सबके बीच देश के प्रधानमंत्री काफी खुश नज़र आ रहे थे, और भला खुश भी क्यूँ न हो, 2 साल में योग को विश्व स्तर पर ले जाने में उनका ही तो सारा योगदान था. उनकी छाती 56 से 58 इंच हुई जा रही थी. मीडिया देशी हो या विदेशी, खबरें और तसवीरें लेने में मगन था. इन सब हो-हल्ला के बीच एक और इंसान था, जो काफी खुश था. ये योग वाला दिन उसके लिए नया-नया था. कई दिनों बाद उसे लगा की अच्छी कमाई होगी. उसकी नज़रें योग करते लोगों पर नही थी, बल्कि वो तो ऐसे लोगों को ढूंढ रहा था जो योग कर के उठ रहे थे और अपने घर की तरफ जाने के लिए कोई सवारी ढूंढ रहे थे. ऐसे में मोटे तोंद वाले अंकल उठे और सबकी नज़र बचा के जल्दी से योग वाले स्पॉट से निकल कर घर जाने वाले स्पॉट की तरफ बढ़ने लगे. उस इंसान ने तोंद को देख लिया और अपनी साइकिल रिक्शा धीरे-धीरे उनकी तरफ ले जाने लगा.

“कहाँ चलेंगे, आइये न छोर दें,” रिक्शावाले ने धीरे-धीरे अपनी रिक्शा उनके पीछे लेते हुए कहा.
“नही नही, यहीं पास में घर है, चले जायेंगे हम पैदल,” तोंद वाले अंकल तेज़ कदमों से आगे बढ़ते रहे, मानो वो रिक्शा नही, दुश्मन का कोई टैंक हो.
“अरे सर, जो मन हो दे दीजियेगा, आइये बैठिये, हम पहुँचा देते है न,”

पहले तो तोंद वाले अंकल योग के तेज से पैदल ही निकल पड़े थे, लेकिन 10 कदम चलने पर याद आया की साल में एक दिन का योगा कर के कोई फायदा है नहीं. इसलिए वो चलते-चलते रुक गए और कहा,
“कितना लोगे?”
“अरे जो मन में आये दे दीजियेगा,”
“नही-नही बाद में कोई बकवास नही चाहिए, बोलो कितना लोगे,”
“अब आपसे क्या कहें, बरे लोग हैं, 60 रुपैया दे दीजियेगा,”
“अरे लूट मचा है क्या, यहाँ से मुश्किल से 2 km होगा, 50 देंगे, चलना है तो चलो,”

थोड़ी देर तक अपने गंदे भीगे हुए गमछे से अपना गन्दा पसीना पोछने के बाद उसने कहा,
“ठीक है, आइये, बैठिये, अब आप बारे लोग से क्या मोल-मोलइ करना,”

तोंद ने अपना सारा भार उस मरियल से दिखने वाले रिक्शा वाले पे रख दिया और रिक्शा चल पड़ी. तोंद ने सोचा अच्छा हुआ रिक्शा मिल गयी, नही तो जान निकल आती.
इधर वो गंदे से पसीने से नहाया हुआ गंदे रिक्शे वाले ने सोचा,
“चलो अच्छा है, 100 रुपैये रिक्शा का किराया देने के बाद कम से कम एक पाव दाल तो खरीद ही सकता हूँ. कई दिनों बाद आज तो दाल भी मिलेगी खाने को.
आज तो सच में दिन अच्छा है.”