उत्तराखंड की आग, षड़यंत्र या इत्तेफाक?

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आप में से कई ने टीवी में, अख़बारों में और कभी-कभी सोशल मीडिया पर भी उत्तराखंड की आग के बारे में देखा, सुना या पढ़ा जरुर होगा. उत्तराखंड के जंगलों में लगी आग का कारण आपको बढती गर्मी और हीट वेव जैसा अगर कुछ लग रहा है, तो फिर से सोचिये. ये एक प्राकृतिक घटना जैसी लगती है, लेकिन है नहीं. ये साजिश है. साजिश पैसे कमाने का, साजिश जंगल की जमीन को बिना किसी लीगल हर्डल के हड़पने का, साजिश जंगल के लकड़ियों का बिना किसी दिक्कत के स्मग्लिंग करने का.

लोकल बिजनेसमैन, पोलिटिकल लीडर्स, माफिया और सरकार की मिलीभगत से इसे पिछले कई दशकों से अंजाम दिया जा रहा है. हर साल ऐसी आग लगायी जाती है और हर साल इसे ऐसा दिखाया जाता है मानो ये प्राकृतिक घटना हो. किस्सा ऐसे शुरू होता है की इन बड़े लोगों द्वारा स्थानीय लोगों को कुछ पैसे दे कर जंगल में आग लगवाई जाती है. लेकिन इस आग को कंट्रोल्ड तरीके से जलने दिया जाता है, जिससे जंगल जल भी जाये और उसमे टिम्बर या और उपयोगी लकडियाँ बच भी जाये, जिसे बाद में फ़ोकट में उठा कर महंगे दामों में बेच दिया जाये. और जहाँ फ़ोकट में पैसे कमाने की बात हो वहां लोकल नेता और माफिया की सांठ-गाँठ न हो, भला ये कैसे हो सकता है. इस आग का फायदा वो बिजनेसमैन भी उठाते हैं, जिन्हें जंगल की ज़मीन हड़पनी हो लेकिन जंगल में पेड़ों के अस्तित्व के कारण जिन्हें लीगल ट्रबल का सामना करना पड सकता है, जैसे फोरेस्ट डिपार्टमेंट से क्लीयरेंस लेना हो या फिर पर्यावरण मंत्रालय से. अब जब न जंगल होंगे, न पेड़, तो भला क्लीयरेंस का क्या झंझट.

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सॅटॅलाइट से ली गयी इस तस्वीर में कई जगहों पर लगी आग को देखा जा सकता है. उत्तराखंड में 2 महीने से ऊपर ये आग जली है, जिसमे एक मोटे अनुमान के मुताबिक 3000 हेक्टेयर जंगल की प्राकृतिक सम्पदा जल के राख हो चुकी है. शायद इस बार कंट्रोल्ड तरीका थोडा ज्यादा ही आउट ऑफ़ कण्ट्रोल हो गया. इसमें कोई आश्चर्य की बात नहीं है की मीडिया को कुछ और बातों में ज्यादा इंटरेस्ट रहा, जैसे किसी की फर्जी डिग्री जाँचना, या किस का ब्रेक-अप, कब, किसके साथ हुआ या फिर किसका हूक-अप कब, किसके साथ नहीं हो सका.

हमें जरुरत है पेड़ों और जंगलों के महत्व को समझने की, उसको बचाने की. ये कोई महज संयोग नहीं है की हर साल समंदर का जलस्तर बढ़ता जा रहा है, गर्मियों में तापमान रिकॉर्ड तोड़ रहा है, गर्मी से सड़कें पिघल रही है और कभी भी कोई भी बड़ा सा तूफ़ान हमारे शहरों की ओर चला आता है. किसी पेड़ के ऊपर मारी गयी कुल्हारी, खुद हमारे पैरों पर आ कर लग रही है. कभी-कभी कुदरत सँभलने का मौका भी नहीं देती, ये बात याद रखनी होगी. क्यूंकि अगर ऐसा होता तो आज डायनासोर भी जिंदा होते. इक कहावत है:

When the last tree is cut down, the last fish eaten and the last stream poisoned, you will realize that you cannot eat money

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