हरी चटनी वाले बाबाजी और उनकी “कृपा”!

nirmal

हम सब के साथ कभी-कभी ऐसा होता है की कई महीनों पहले या कई सालों पहले की कोई बात याद आ जाती है और अचानक से हँसी छूट जाती है. ऐसा ही कुछ हुआ मेरे साथ.
एक टेलीविज़न चैनल पर देखा ऐसा ही एक वाकया याद आ गया. और ये लाफ्टर चैलेंज और कॉमेडी विद कपिल के आने से भी पहले की बात है. उस शो को होस्ट करते हैं एक बाबाजी.

बाबाजी, बाबा बनने से पहले ठेकेदारी का काम करते थे, फिर ठेकेदारी में घाटा हुआ, तो कपडे का बिजनेस खोल लिया, फिर वो फेल हो गया तो थोड़े दिन माइनिंग के धंधे में भी हाथ आजमाया. ये सब एक आम इंसान बनकर. लेकिन इनको एक नए बिज़नेस का आईडिया आया, जो इंडिया में तो चलना हि चलना था, वो भी बिना किसी रिसेशन के डर के. और वो आईडिया था, भगवान के नाम पे लोगों को “बनाने” का. बाबाजी की जिंदगी में ये “यूरेका” मोमेंट कब और कैसे आया, इसके पीछे भगवान खुद थे या कोई और परलौकिक शक्ति थी, ये तो नही पता, लेकिन जो भी थी, उसने बाबाजी के कैरियर को एक नयी दिशा दे दी. बाबाजी देखते ही देखते कई टीवी चैनल्स पर आने लगे, हर छोटे बड़े शहर में शोज करने लगे और लोगों पर “कृपा” बरसाने लगे. लोगों ने भी बदले में उनपर खूब कृपा बरसाई और बाबाजी की दिन दूनी रात चौगुनी तरक्की होने लगी, बैंक बैलेंस हजारों करोड़ में खेलने लगा.

लेकिन हर बाबा की तरह ये भी अपने भक्तों से कुछ मांगते नहीं है, बस ये भक्त ही इतने भोले होते हैं की भले ही इनका बैंक बैलेंस ख़त्म हो जाये लेकिन बाबाजी की “कृपा” के चक्कर में बाबाजी का बैंक बैलेंस बढ़ाते रहते हैं. लेकिन इसमें कोई आश्चर्य की बात नहीं है, ऐसा तो हर बाबाजी के साथ होता है. भक्त बंद आँखों से, मेरा मतलब है, आस्था की आँखों से, दान करते जाते हैं, और बाबाजी का बैंक बैलेंस फूलता जाता है. आश्चर्य मुझे आता है बाबाजी के “कृपा” बरसाने के तरीके सुन-सुन कर. बाबाजी से आप चाहे कितना से कितना कठिन सवाल पूछ लीजिये, आपके सामने चाहे कितनी भी बड़ी परेशानियाँ क्यूँ न खड़ी हों, बाबाजी अपना “थर्ड ऑय” खोल कर हर मुश्किल को भस्म कर देते हैं और इतना सिंपल सा उपाय बताते हैं की अपने कानों पर भरोसा ही न हो. परेशानी अगर खुद सुन ले, तो शर्मा कर भाग जाये की मियाँ किस इंसान से पाला पर गया, अपनी भी कोई इज्जत है की नही, दिन-दहारे ऐसी बेइज्जती.

अब मै आपको बाबाजी के “कृपा” बरसाने के कुछ किस्से बताता हूँ, ऐसे किस्से तो इतने हैं की आप थक जाओ सुनते-सुनते, लेकिन किस्से ख़त्म नही होंगे, इसलिए आपको 2-3 उदाहरण देता हूँ, जिसके बाद आप बाबाजी के “कृपा” देने के पैटर्न को समझ जायेंगे.

उदाहरण 1:

भक्त: बाबाजी, बहुत मुश्किल में फंसा हूँ, नौकरी नही मिल रही, क्या करूँ?
बाबाजी: समोसा खाते हो?
भक्त: जी बाबाजी.
बाबाजी: हरी चटनी के साथ खाते हो या लाल चटनी के साथ?
भक्त: जी लाल चटनी के साथ बाबाजी.
बाबाजी: जाओ, हरी चटनी के साथ समोसा खाओ, कृपा आनी शुरू हो जाएगी.
भक्त: जी बाबाजी.
(भक्त बेचारा बैठ गया, उसे क्या समझ में आया पता नही, लेकिन मेरी बुद्धि ने तो काम करना बंद कर दिया.)

उदाहरण 2:

भक्त: बाबाजी, मेरा बिज़नेस में घाटा हो रहा है, मै क्या करूँ.
बाबाजी: हनुमान जी को लड्डू चढ़ाव, कृपा आनी शुरू जो जाएगी.
भक्त: जी, चढ़ाता हूँ.
बाबाजी: अच्छा, कौन सी चढाते हो, बेसन के या बूंदी के.
भक्त: जी बूंदी के.
बाबाजी: बस यहीं कर दी न गलती, बेसन के चढ़ाओ, कृपा आनी शुरु हो जाएगी.
भक्त: जी बाबाजी.

उदाहरण 3:

भक्त: बाबाजी…………………………………………………मै क्या करूँ?
बाबाजी: तुम अपनी कमीज़ की बटन कैसे खोलते हो, जल्दी जल्दी या देर से?
भक्त: जी……….मम्म……कभी जल्दी तो कभी देर से भी.
बाबाजी: आराम-आराम से खोला करो, कृपा आनी शुरू हो जाएगी

ऐसे ही कई किस्से हैं, तरीके हैं, जिनसे बाबाजी अपने भक्तों पर “कृपा” बरसाते रहते हैं. अगर सबको लिस्ट करूँ तो शायद रामायण, महाभारत से भी बड़ा कोई महामहाकाव्य बन जायेगा. लेकिन न आपके पास उतना वक़्त है सुनने का, और न ही मेरे पास सुनाने का. इतने किस्से सुनकर आपको पता तो लग ही गया होगा की मै किस बाबाजी की बात कर रहा हूँ. लेकिन यहाँ महत्वपूर्ण, बाबाजी का नाम जानना नही है, उससे ज्यादा महत्वपूर्ण है ऐसे भक्तों का नाम जानना जो 4000 से 5000 रुपैये का टिकट ले कर ऐसी-ऐसी सलाह लेते हैं और ख़ुशी-ख़ुशी घर भी लौट जाते हैं. ऐसे भक्तों का जो बाबाजी के अकाउंट में डायरेक्ट मनी भी ट्रान्सफर करते हैं. और इन भक्तों में काफी संख्या में पढ़े-लिखे लोग भी होते हैं. बाबाजी का तो अब तक स्विट्ज़रलैंड में बैंक अकाउंट खुल गया होगा और लन्दन जैसे बड़े शहरों में 10-20 फ्लैट भी बुक हो गए होंगे, लेकिन इन भक्तों को कृपा के नाम पर आखिर क्या मिला? समोसे की हरी चटनी और बेसन के लड्डू? वाह रे ऊपर वाले, तेरी “कृपा” भी निराली है.

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