जाटों का जंगलराज – पार्ट 2: जल्द आ रहा है

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जनवरी 2016 तक, जब भी कहीं “जाट” शब्द सुनाई देता था, तो दिमाग में एक चित्र बन जाता था. एक ऐसे लम्बे-चौड़े, खाते-पीते घर का लौंडा, जिसकी लम्बी-लम्बी मूँछे हैं, हाथ में लम्बी सी लाठी है, जिसकी आवाज भले ठेठ हो लेकिन जिसका दिल सच्चा और भोला-भाला हो. जो आपकी दोस्ती की खातिर मरने और मारने को कभी भी तैयार मिलता. लेकिन फ़रवरी महिने का अंत होते-होते, ये छवि ऐसी धूमिल हुई की अब अगर 10 बार भी ये शब्द सुनाई दे तो वो पुरानी छवि भूलकर भी मेरे सपने में भी नही आती. उसकी जगह एक ऐसी दागदार छवि ने ले ली, जिसको शायद ही मै कभी भूल पाउँगा. और मै अकेला ही क्यूँ, पुरे देश ने इस नए जाट छवि को अपनी आँखों से देखा है. शायद वो भी कभी नही भूल पाएंगे.

इसकी शुरुआत हुई जाट लोगों के उस मुद्दे को लेकर आन्दोलन से, जो हिंदुस्तान के लिए कश्मीर मुद्दे के बाद दूसरा बड़ा नासूर बन चूका है, और वो है आरक्षण. अब हिन्दुस्तान में जहाँ पूरी की पूरी राजनीती ही आरक्षण और जाति के आसपास घूमती रहती है, वहाँ भला अगर जाटों ने आरक्षण माँग लिया तो क्या गलत किया. नही गलत तो कुछ भी नही किया, लेकिन जिस तरह से हरियाणा की इज्जत को तार-तार कर ये माँगा गया, वो बड़ा ही घिनौना लगा. इस शांतिपूर्ण आन्दोलन की सबसे ख़ास बात ये रही, की इसमें शांति को छोड़कर बाकी सभी चीजों की पूर्णता थी.

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दूकानें लूटी गयी, जो लूटी न जा सकी उनमे आग लगा दी गयी, बसें जलाई गयी, ट्रेन रोकी गयी, कुछ लोगों को कत्ल भी कर दिया गया. जब सबसे मन नहीं भरा तो सड़क से गुजरती अपनी ही बेबस माँ-बहनों को उनकी गाडी से जबरदस्ती उतार कर उनका बलात्कार भी कर दिया गया. कुल मिलाकर अपनी हैवानियत के नए-नए रिकॉर्ड बना दिए गए. जब तक ये पागलपन रुका, तब तक 30 लोगों जान से हाथ धो बैठे थे और कई औरतें अपनी इज्जत से. और 5 बिलियन डॉलर का जो नुकसान इन्होने जनता की या सरकारी प्रोपर्टी को नष्ट कर के किया, वो अलग.

हालाँकि वोट की लाचार सरकार ने इस हिंसा को काबू में करने को कुछ खास किया नही और अंत में उनकी मांगे मानकर उनके सामने घुटने टेक दिए. रिजर्वेशन बिल आया और पास भी हो गया. लेकिन उसपर अदालत ने रोक लगा दी. तो अब जाट फिर से नए सिरे से आन्दोलन की तैयारी में जुट गए हैं. आने वाली 5 जून को “शांतिपूर्ण” धरने की तारीख मुक़र्रर कर दी गयी है. 5 जून भी आएगा, आन्दोलन भी शुरू होगा, अब देखना है की इस बार ये आन्दोलन कितना शांतिपूर्ण होता है.

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