जहाँ जिंदगी मर के जी उठती है.

सुकूँ था वहाँ, क्यूँकी
न कोई कुछ पूछने वाला था,
न कोई कुछ बताने की,
ख्वाहिश ही रखने वाला,

किसी को न कहीं,
जाने की जल्दी थी,
न किसी को कहीं से,
आने की,

कोई भागदौड़ नहीं,
कोई आपाधापी नही,
कोई ईर्ष्या नही,
कोई धोखेबाजी नही,

न किसी ने मेरा धरम पूछा,
न किसी ने मेरी जात,
बैठने दिया मुझे,
बेफिक्र अपने पास,

शायद जी रहे थे,
वो असल जिंदगी,
मरने के बाद,
कब्रिस्तान में यारों,
जिंदगी मर के जी उठती है.

फर्जी डिग्रियों का खूनी खेल, बिहार में नही, MP में – Vyapam

फर्जी डिग्रियों का खूनी खेल, बिहार में नही, MP में – Vyapam

IIT का रिजल्ट आ चुका है. कई बिहारियों ने बाजी मारी है. हर साल ही मारते हैं, IIT हो या IAS या कोई भी और एग्जाम, कोई नयी बात तो मै बता नही रहा हूँ. बिहारी लौंडे छोड़ते नही है कोई भी चीज. इस बार इसलिए बता रहा हूँ की अभी-अभी फर्जी टॉपर के नाम से दिन रात न्यूज़ चला-चला के मीडिया वालों ने बहुत TRP बढाई है और बहुत पैसा कमाया है. खैर उनको बधाई भी देता हूँ की उनकी वजह से मामला खुला और कई लोग फिलहाल के लिए तो अन्दर जा ही चुके हैं. अब ये तो आपको पता ही है की IIT में सेलेक्ट हुए किसी लौंडे का इंटरव्यू लेने मीडिया वाले तो जायेंगे नही, क्यूंकि बिहार की नेगेटिव इमेज ही बिकती है सारी मीडिया में, और जो बिकती है उसे ही बेचा और परोसा जाता है.

लेकिन इस टॉपर फर्जीवाड़े में जहाँ मीडिया ने इतनी चुस्ती दिखायी है, तो मुझे देश का सबसे खूनी फर्जीवाडा बरबस ही याद आ जा रहा है, जिससे मीडिया पता नही क्यूँ दूरी बना के बैठी है. इसका कारण राजनीतिक तो पक्का ही है क्यूंकि उस फर्जीवाड़े में राज्य के मुख्यमंत्री और उनकी फॅमिली भी संदेह के घेरे में है. फर्जीवाड़े का नाम है, व्यापम, व्यावसायिक परीक्षा मंडल. ये व्यापम राज्य सरकार के अंतर्गत आती है और शिक्षक, डॉक्टर, फ़ॉरेस्ट गार्ड, पुलिस जैसे महकमों में नियुक्ति के लिए परीक्षाएं आयोजित करवाती है. साल 2000 में इसके सुर्ख़ियों में आने के पहले तक लगभग 10-15 साल तक ये फर्जीवाडा होता रहा. इस फर्जीवाड़े की कहानी इतनी लम्बी है की 10-20,000 पन्नों में भी न आये. इसलिए इसकी मुख्य बातें आपको बताता हूँ:

मध्यप्रदेश में होने वाले इस एग्जाम में हर तरह से चोरी/फर्जीवाडा कराया गया. जैसे डमी कैंडिडेट बिठाना, चीटिंग कराना, OMR शीट एक्सचेंज करा देना, answer लीक कर देना और वैसे सभी तरीके जो आप सोच सकते हैं. ये सारे कैंडिडेट्स देश के कई राज्यों से पैसे दे कर बुलाये जाते थे और दूसरों की जगहों पर बैठ के एग्जाम देते थे. एग्जाम के बाद आंसर शीट को भी इधर-उधर कर के मार्क्स का घपला किया जाता था. इसमें ऊपर से ले कर नीचे तक हर तरह के लोग शामिल हैं. क्यूंकि बिना सबको दक्षिणा चढ़ाये 15 साल तक इतने बड़े पैमाने पर फर्जीवाडा करना संभव ही नही है.

इसका भेद खुलने के बाद से अभी तक 2000 लोग हिरासत में आ चुके हैं. इसकी जांच सीबीआई कर रही है. इस फर्जीवाडे से न जाने कितने ही डॉक्टर बन चुके हैं जो शायद कहीं न कहीं मरीजों की जिंदगी से खिलवाड़ कर रहे होंगे. कई ऐसे शिक्षक होंगे जो बच्चों को पढ़ा कम रहे होंगे और पैसे कमाने के अलग-अलग तरीके ढूंढ रहे होंगे, आखिर जितना लगाया है शिक्षक बनने में उतना तो निकालेंगे न.

सबसे जरुरी बात की इससे जुड़े लोग जब-तब अन-नेचुरल डेथ का शिकार होते रहते हैं. कभी कोई बिचौलिया सड़क हादसे में मारा जाता है, तो कभी केस से जुडी किसी लड़की की लाश रेलवे ट्रैक के किनारे पाई जाती है, जिसे एक रेल से गिरने जैसी दुर्घटना मान कर केस बंद कर दिया जाता है. कभी जेल में बंद आरोपी की “नेचुरल” मौत हो जाती है. एक केस में तो बॉडी पंखे के नीचे बस पाई गयी थी, न रस्सी का नामोनिशान, न गले में कोई दाग, उसे भी सुसाइड मानकर केस रफा दफा कर दिया गया. हाल ही में इस केस की जांच से जुड़े एक पत्रकार की भी रहस्यमय हालत में मौत हो गयी, जो रेलवे ट्रैक के किनारे मिली लड़की के घरवालों से मिलकर पूछताछ कर रहे थे. इस मौत को भी “नेचुरल” डेथ मानकर उसकी भी फाइल बंद कर दी गयी.

कुल मिलाकर ये एक खुनी खेल है, जो बहुत ही सोच समझ कर खेला जा रहा है. इनके सामने तो फर्जी टॉपर वाला काण्ड कहीं टिकता भी नही है. हो मीडिया वाले भैया, कहाँ है आपलोग भाई? बिहार और दिल्ली को छोड़ कर कुछ और खबर भी दिखाइए. इ जो खुनी खेल चल रहा है और खूनी आराम से खुलेआम घूम रहा है, उसकी भी तनिक चिंता कीजिये.

ये ओछी राजनीति छोडिये केजरीवाल साहब!

ये ओछी राजनीति छोडिये केजरीवाल साहब!

मै कैसे संबोधित करूँ आपको, समझ नही आ रहा. श्री अरविन्द केजरीवाल कहूँ, मुख्यमंत्री साहब कहूँ या फिर भावी प्रधानमन्त्री साहब कहूँ! ऐसे सोचा तो यही था की आपको आम आदमी कह कर ही संबोधित करूँगा, लेकिन मुझे लगता है की अब आप आम आदमी रहे नही. न आम आदमी का जज्बा रहा, न उसके जैसी सोच और न एक आम आदमी की सैलरी ही, फिर काहे का आम आदमी.

आपका और इस देश का हितैषी हूँ, इसलिए कुछ हकीकतों से आपको बस रूबरू कराना चाहता हूँ, जिससे आपको शायद प्रधानमंत्री बनने में आसानी हो. आपको पता है, की आप दिन-ब-दिन इस देश की जनता की निगाहों में गिरते जा रहे हैं. पहले आपने आम आदमी पार्टी के संस्थापकों को निकाला, फिर अपनी सैलरी को ख़ास आदमी जितना बढ़ा लिया और फिर आखिर में अब आप टुच्चे राजनीतिज्ञों जैसी जात-पात जैसी राजनीती पर उतर आये हो. आपने लोगों को निकाला, सही किया, मगर बिना कोई ट्रायल के, बिना किसी रीज़न के, वो गलत किया. जो आम आदमी देश में जनता को पूछ कर पॉलिसी बनाने की बातें किया करता था, अचानक से वो इतना अहंकारी कैसे हो गया की बॉलीवुड स्टाइल में नो FIR, नो ट्रायल, फैसला ऑन द स्पॉट करने लगा. अरे इतनी आज़ादी तो अंग्रेजों ने भगत सिंह, सुखदेव को भी दी थी. उनका भी ट्रायल चला था, झूठा ही सही.

आपने अपनी सैलरी बढाई, चलो ठीक काम किया. अब आप भूखे रह कर, पसीने में सरोबार हो कर तो काम नही कर सकते न. वो दिन कुछ और थे जब अन्ना आन्दोलन में आप रेलवे स्टेशन पर अखबार बिछा कर सो जाया करते थे और हम उस फोटो को सोशल मीडिया पर शेयर करते नही थकते थे. अब आप मुख्यमंत्री हैं, भावी प्रधानमंत्री है, तो भला आम आदमी वाली मुश्किलें क्यूँ झेले. खैर उससे मुझे कोई प्रॉब्लम भी नही है. मुझे प्रॉब्लम है उस अखबार और रेडियो के विज्ञापनों से, जिसपर आप हमारा पैसा, जनता का पैसा पानी की तरह बहा रहे हैं. दिल्ली की कहानी गोवा के अख़बारों में सुना रहे हैं, पंजाब में बता रहे हैं, देश भर में ढिंढोरा पीट रहे हैं. अब इसपर अगर आप ये कहेंगे की आपके विरोधी भी यही करते हैं तो मै ये कहूँगा की आपके विरोधियों से हमने कभी और कोई उम्मीद भी नहीं की थी, आम आदमी आपको समझकर वोट किया था. जब विरोधी के जैसा ही काम करना था, तो हम अपना वोट आपको क्यूँ देते, विरोधियों को न देते, कम से कम उनकी कथनी और करनी में फर्क तो नही होता.

जाते-जाते एक और बात, ये जो पंजाब इलेक्शन के कारण आपने पंजाबी शिक्षा को अनिवार्य करना, पंजाबी शिक्षकों का वेतन बढ़ाना और फ्लाईओवर का पंजाबी नामकरण करना जैसी तुच्छ हरकतें कर रहे हैं न, ये आपको आम आदमी से निकाल कर मतलबी राजनीतिज्ञ की श्रेणी में लाकर खड़ी कर रही है. ये सब चीजें अगर आप कभी और करते न, जब इलेक्शन का नाम न होता, तो शायद आपको युगपुरुष मान भी लेता मै. लेकिन आज ये सारी चीजें कर के आप अपना घटता हुआ कद और घटा रहे हैं. जात-पात या धर्म-मजहब से ऊपर उठकर जो शिक्षक अपने स्टूडेंट्स में ज्ञान का अलख जगाये रखते हैं, उन शिक्षकों को आपने पंजाबी, बिहारी, मद्रासी स्तर पर बाँट दिया? फिर कैसी शिक्षा वो अपने स्टूडेंट्स को दे पाएंगे. एक पल के लिए नेताओं वाला कुरता पायजामा उतर कर, ज़रा आम आदमी वाला चोंगा पहन कर सोचिये, कुछ गलत दिखेगा आपको.

आपके किस्से तो और भी हैं, पर उनका जिक्र कभी और करूँगा. बस कहना इतना ही है की इन सब ओछी हरकतों से आप भले ही प्रधानमंत्री बन भी जाएँ, लेकिन याद रखियेगा, तब तक आम आदमी की नज़रों से आम आदमी गिर चूका होगा, आप गिर चुके होंगे. अफ़सोस इस बात का नही होगा की आप गिर चुके होंगे, क्यूंकि इस देश के लिए आपके जैसे कई आम आदमी कुर्बान होते आये हैं और कुर्बान होते रहेंगे, अफ़सोस बस ये रहेगा की तब तक आपने आम आदमी को आम आदमी की नज़रों में पूरी तरह गिरा दिया होगा.

फेसबूकिया क्रांतिकारी – द सुपर ह्यूमन

फेसबूकिया क्रांतिकारी – द सुपर ह्यूमन

कुछ दिनों पहले दुनिया के बड़े-बड़े वैज्ञानिकों ने एक रिसर्च की थी और रिपोर्ट जारी की थी, जिसमे ह्यूमन ब्रेन एंड इट्स डेवलपमेंट पर लिखा गया था. उसमे इम्पोर्टेन्ट बात ये थी की ह्यूमन ब्रेन अभी भी डेवलपिंग फेज में हैं और एक दिन ऐसा आएगा जब ह्यूमन ब्रेन इवॉल्व या डेवलप करना बंद हो जायेगा. मतलब इस दिमाग का इतना विकास हो जायेगा की इसके आगे और कोई इम्प्रूवमेंट संभव ही नही है. फिर मैंने सोचा की अगर वैसा दिन आयेगा तो जरुर ही इंसानी दिमाग एक सुपर कंप्यूटर जैसा हो जायेगा, जो सुपर स्पीड से काम करेगा और और जिसके पास विकिपीडिया जैसा हर सवाल का सही जवाब रहने लगेगा. अच्छा ख्याल था. सोच कर ही दिल खुश हो गया.

लेकिन आपको यकीन हो न हो, वो दिन अब आ चुका है. ऐसे लोगों से मै मिल चूका हूँ, उनको देख चुका हूँ और इस बात से काफी खुश रहता हूँ की चलो वो दिन मैंने देख लिया, जिसको मै सपने में देखा करता था. मेरे लिए ये वही मोमेंट है जो कुछ लोग कहते हैं न I was alive when blah blah blah happened. मेरे लिए ये ब्लाह ब्लाह हो चुका था. मजे की बात तो ये है की ये सब मेरे फ्रेंड सर्किल में आते हैं. जी हाँ – ये हैं मेरे फेसबुक के दोस्त. इन्हें प्यार से मै फेसबूकिया क्रांतिकारी कहता हूँ. ये मेरे लिए तो सुपर ह्यूमन से कम नही हैं. चलता-फिरता ज्ञान का भण्डार हैं ये. इनके पास दुनिया की सारी नॉलेज है. इन्होने कभी क़ुरान नही पढ़ी, लेकिन इस्लाम के बारे में सब जानते हैं, मनुस्मृति देखी भी नही होगी, लेकिन मनुवाद का ज्ञान है. जिन्ना ने क्या गलत किया और नेहरु ने क्या सही, ये सब जानते हैं. गाँधी को तो अपने सामने ये खड़े भी होने नही देते. इनके सामने इतिहास के बड़े-बड़े विद्वान भी शर्मिंदा हो जायेंगे.

इनकी डिक्शनरी में “नही जानते” शब्द है ही नही. भारत में, दुनिया में या मंगल पे क्या हो रहा है, इन्हें सब पता है, किसी सवाल के जवाब में ऐसा कोई उत्तर ही नही मिलेगा जिसमे ये कह दें की भाई “नही जानते”. राजनीती हो, अर्थशास्त्र हो, कूटनीति हो या फिर कोई भी ऐसी XYZनीति, ये सब के ज्ञाता हैं. आपको भले भरोसा न हो पर देश की विदेशनीति मोदी जी के कहने पर नही, इनके कहने पर बनायी जाती है और रघुराम राजन तो बस नाम के गवर्नर हैं, RBI की सारी पौलिसी तो ये अपने मोबाइल पर बना के राजन जी को sms करते हैं. बरमुडा ट्रायंगल का रहस्य शायद हमारे वैज्ञानिक सर पटक-पटक कर ढूँढने में लगे होंगे, लेकिन इन्हें वो भी पता है.

विकास कैसे होगा, भ्रष्टाचार कैसे मिटेगा और गरीबी कैसे हटाई जा सकती हैं, इन्हें सब मालूम है. और तो और ये सब काम ये घर में बैठे-बैठे, या लेटे-लेटे अपने टच स्क्रीन मोबाइल फ़ोन से कर देते हैं. किसान आत्महत्या करे तो उसको अन्न पंहुचा देते हैं, सूखा पड़े तो मोबाइल से खेतों की सिंचाई कर देते हैं. इन्हें राजनीती में जाना गन्दा काम लगता है, इसलिए बिना गए और बिना वोट दिए अपना मुख्यमंत्री और प्रधानमंत्री भी चुन लेते हैं. और किसी से कोई गलती हो जाये तो फेसबुक पर खुला ख़त या खुली चिट्ठी, मतलब ओपन लेटर, भी लिख देते हैं, जो लेटर सीधे प्रधानमन्त्री और मुख्यमंत्री की जेब में जा के गिरती है.

ये क्रांतिकारी बांटने में विश्वास रखते हैं, इसलिए फेसबुक पर भर-भर के ज्ञान बाँटते हैं. ये भले खुद दिन में 12 बजे उठते हों, लेकिन सुबह उठने के फायदे वाले पोस्ट ये जरुर शेयर करते हैं. मम्मी ने बाज़ार से दूध या सब्जी लाने को कह दिया तो ऐसे चिल्ला उठेंगे मानो वो हरे रंग वाले हल्क की आत्मा इनमे घुस गयी हो, लेकिन फेसबुक पर हैप्पी मदर्स डे लिखना नही भूलेंगे. गलती से बाबूजी ने दवाई लाने को कह दिया तो घर से निकल भागेंगे और 3 दिन बाद ही घर लौटेंगे, लेकिन फेसबुक पर श्रवण कुमार वाली पोस्ट शेयर करेंगे. देश और दुनिया में हो रहे जुल्म पर ये जोर-जोर से आवाज उठाते हैं. सूखे में मर रहे किसानों के लिए ये सरकार से जवाब तलब करते हैं. सहिष्णुता और असहिष्णुता पर लम्बे-लम्बे पोस्ट लिख डालते हैं. हर दिन एक नए मुद्दे को हाथ में लेते हैं और शाम होते-होते उसका समाधान निकाल कर दुनिया के सामने रख देते हैं की लो हे तुच्छ मनुष्यों, मैंने आज तुम्हारी एक और समस्या का आज समाधान कर दिया.

ऐसे सुपर ह्यूमन आपके आस-पास भी होंगे, बस आपको पहचानने भर की देर है. ऐसे इनके कुछ लक्षण हैं जिससे आप इनकी पहचान कर सकते हैं. ये सुनना कम और बोलना ज्यादा पसंद करते हैं. ये थेथरलौजी में Ph.D होते हैं. इनके हाथ में हमेशा मोबाइल रहता है और उससे प्रकाश ऐसे ही निकलता है जैसे कभी देवताओं के हाथ से निकला करता था और एक मरे हुआ आदमी को जिंदा कर जाता था. और सबसे जरुरी लक्षण, इनकी डिक्शनरी में “नही जानते” शब्द नही होता.

कांग्रेस ही कांग्रेस की दुश्मन है.

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लुटियन जोन से खबर उड़ी है की श्री राहुल गाँधी जल्द ही कांग्रेस की कमान संभालेंगे. अच्छा है, संभाले. किसने मना किया है. उनकी पार्टी है, उनकी मर्जी है और उनकी मर्जी ही चलती है. लेकिन सवाल उठता है की कमान संभाल के ऐसा वो क्या कर लेंगे, जो अब तक नही कर पाए. ऐसे समय में जब कांग्रेस केंद्र में नही है, हर तरफ राज्य में चुनाव हार रही है और आने वाले समय में महत्वपूर्ण चुनाव बचे हैं, जैसे उत्तरप्रदेश का चुनाव, पहले से कमज़ोर होती जा रही पार्टी क्या और कमज़ोर नही होगी.

अब तक के चुनाव या रैलियों में जितना राहुल गाँधी को देखा और सुना है, उससे तो कहीं से नही लगता की उनमे ऐसा कोई स्पार्क है, जो युवाओं को, हिन्दुस्तानियों को या फिर सोसाइटी के किसी भी सेक्शन को कभी पसंद आया हो. पार्टी के अन्दर भी उनकी इज्जत बस इस वजह से की जाती है की वो नेहरु-गाँधी वंश के वारिस हैं. और अन्दर भी इज्जत कम और जी हुजूरी करने वालों की संख्या भी ज्यादा ही होगी.

अब जब मोदी सरकार बिना किसी घोटाले या “लगभग” साफ़-सुथरी छवि के साथ अपने 2 साल पुरे कर तीसरे साल में कदम रख चुकी है, तब कांग्रेस पार्टी को अपने को मज़बूत करने की जरुरत है. तीसरा मोर्चा न आज तक सफल हुआ है, और न ही होगा, क्यूंकि उस मोर्चे में विचारधाराओं की एकता कम और प्रधानमंत्री की कुर्सी के लिए एकता ज्यादा होती है. UPA के बाकी दल भी कोई बहुत मज़बूत स्थिति में नहीं है. ऐसे में अगर कांग्रेस को 2019 के चुनावों में अपने को मजबूत स्थिति में देखना है ताकि बाकि दल भी उसके साथ होकर सरकार का एक विकल्प दे सकें, तो उसके लिए आज से ही ज़मीनी स्तर पर काम करने की जरुरत है. जहाँ कांग्रेस को अपने वंशवाद से बचना होगा वहीँ अपनी पार्टी के अन्दर थोड़ी सी जनतांत्रिक प्रणाली, जिसकी पार्टी में भारी कमी है, से महत्वपूर्ण जगहों पर अच्छे लोगों को नियुक्त करना होगा, जो 2019 में काम आ सके.

दुनिया बदल रही है, समय बदल रहा है, देश की जनता बदल रही है और साथ ही साथ राजनीति भी. 2014 के चुनावों में अगर NDA को बहुमत मिला तो उसका श्रेय कांग्रेस के घोटालों से लिप्त सरकार के साथ-साथ नरेन्द्र मोदी जैसे शक्तिशाली व्यक्तित्व को भी जाता है, जिससे जनता में कुछ आस जगी थी. कांग्रेस को खुद अपने अन्दर भी ऐसे चेहरे ढूँढने होंगे और उनको प्रमोट करना होगा, नही तो 2019 की राह तो मुश्किल होगी ही, पार्टी का भविष्य भी झूलता रहेगा.

जाटों का जंगलराज – पार्ट 2: जल्द आ रहा है

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जनवरी 2016 तक, जब भी कहीं “जाट” शब्द सुनाई देता था, तो दिमाग में एक चित्र बन जाता था. एक ऐसे लम्बे-चौड़े, खाते-पीते घर का लौंडा, जिसकी लम्बी-लम्बी मूँछे हैं, हाथ में लम्बी सी लाठी है, जिसकी आवाज भले ठेठ हो लेकिन जिसका दिल सच्चा और भोला-भाला हो. जो आपकी दोस्ती की खातिर मरने और मारने को कभी भी तैयार मिलता. लेकिन फ़रवरी महिने का अंत होते-होते, ये छवि ऐसी धूमिल हुई की अब अगर 10 बार भी ये शब्द सुनाई दे तो वो पुरानी छवि भूलकर भी मेरे सपने में भी नही आती. उसकी जगह एक ऐसी दागदार छवि ने ले ली, जिसको शायद ही मै कभी भूल पाउँगा. और मै अकेला ही क्यूँ, पुरे देश ने इस नए जाट छवि को अपनी आँखों से देखा है. शायद वो भी कभी नही भूल पाएंगे.

इसकी शुरुआत हुई जाट लोगों के उस मुद्दे को लेकर आन्दोलन से, जो हिंदुस्तान के लिए कश्मीर मुद्दे के बाद दूसरा बड़ा नासूर बन चूका है, और वो है आरक्षण. अब हिन्दुस्तान में जहाँ पूरी की पूरी राजनीती ही आरक्षण और जाति के आसपास घूमती रहती है, वहाँ भला अगर जाटों ने आरक्षण माँग लिया तो क्या गलत किया. नही गलत तो कुछ भी नही किया, लेकिन जिस तरह से हरियाणा की इज्जत को तार-तार कर ये माँगा गया, वो बड़ा ही घिनौना लगा. इस शांतिपूर्ण आन्दोलन की सबसे ख़ास बात ये रही, की इसमें शांति को छोड़कर बाकी सभी चीजों की पूर्णता थी.

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दूकानें लूटी गयी, जो लूटी न जा सकी उनमे आग लगा दी गयी, बसें जलाई गयी, ट्रेन रोकी गयी, कुछ लोगों को कत्ल भी कर दिया गया. जब सबसे मन नहीं भरा तो सड़क से गुजरती अपनी ही बेबस माँ-बहनों को उनकी गाडी से जबरदस्ती उतार कर उनका बलात्कार भी कर दिया गया. कुल मिलाकर अपनी हैवानियत के नए-नए रिकॉर्ड बना दिए गए. जब तक ये पागलपन रुका, तब तक 30 लोगों जान से हाथ धो बैठे थे और कई औरतें अपनी इज्जत से. और 5 बिलियन डॉलर का जो नुकसान इन्होने जनता की या सरकारी प्रोपर्टी को नष्ट कर के किया, वो अलग.

हालाँकि वोट की लाचार सरकार ने इस हिंसा को काबू में करने को कुछ खास किया नही और अंत में उनकी मांगे मानकर उनके सामने घुटने टेक दिए. रिजर्वेशन बिल आया और पास भी हो गया. लेकिन उसपर अदालत ने रोक लगा दी. तो अब जाट फिर से नए सिरे से आन्दोलन की तैयारी में जुट गए हैं. आने वाली 5 जून को “शांतिपूर्ण” धरने की तारीख मुक़र्रर कर दी गयी है. 5 जून भी आएगा, आन्दोलन भी शुरू होगा, अब देखना है की इस बार ये आन्दोलन कितना शांतिपूर्ण होता है.

हरी चटनी वाले बाबाजी और उनकी “कृपा”!

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हम सब के साथ कभी-कभी ऐसा होता है की कई महीनों पहले या कई सालों पहले की कोई बात याद आ जाती है और अचानक से हँसी छूट जाती है. ऐसा ही कुछ हुआ मेरे साथ.
एक टेलीविज़न चैनल पर देखा ऐसा ही एक वाकया याद आ गया. और ये लाफ्टर चैलेंज और कॉमेडी विद कपिल के आने से भी पहले की बात है. उस शो को होस्ट करते हैं एक बाबाजी.

बाबाजी, बाबा बनने से पहले ठेकेदारी का काम करते थे, फिर ठेकेदारी में घाटा हुआ, तो कपडे का बिजनेस खोल लिया, फिर वो फेल हो गया तो थोड़े दिन माइनिंग के धंधे में भी हाथ आजमाया. ये सब एक आम इंसान बनकर. लेकिन इनको एक नए बिज़नेस का आईडिया आया, जो इंडिया में तो चलना हि चलना था, वो भी बिना किसी रिसेशन के डर के. और वो आईडिया था, भगवान के नाम पे लोगों को “बनाने” का. बाबाजी की जिंदगी में ये “यूरेका” मोमेंट कब और कैसे आया, इसके पीछे भगवान खुद थे या कोई और परलौकिक शक्ति थी, ये तो नही पता, लेकिन जो भी थी, उसने बाबाजी के कैरियर को एक नयी दिशा दे दी. बाबाजी देखते ही देखते कई टीवी चैनल्स पर आने लगे, हर छोटे बड़े शहर में शोज करने लगे और लोगों पर “कृपा” बरसाने लगे. लोगों ने भी बदले में उनपर खूब कृपा बरसाई और बाबाजी की दिन दूनी रात चौगुनी तरक्की होने लगी, बैंक बैलेंस हजारों करोड़ में खेलने लगा.

लेकिन हर बाबा की तरह ये भी अपने भक्तों से कुछ मांगते नहीं है, बस ये भक्त ही इतने भोले होते हैं की भले ही इनका बैंक बैलेंस ख़त्म हो जाये लेकिन बाबाजी की “कृपा” के चक्कर में बाबाजी का बैंक बैलेंस बढ़ाते रहते हैं. लेकिन इसमें कोई आश्चर्य की बात नहीं है, ऐसा तो हर बाबाजी के साथ होता है. भक्त बंद आँखों से, मेरा मतलब है, आस्था की आँखों से, दान करते जाते हैं, और बाबाजी का बैंक बैलेंस फूलता जाता है. आश्चर्य मुझे आता है बाबाजी के “कृपा” बरसाने के तरीके सुन-सुन कर. बाबाजी से आप चाहे कितना से कितना कठिन सवाल पूछ लीजिये, आपके सामने चाहे कितनी भी बड़ी परेशानियाँ क्यूँ न खड़ी हों, बाबाजी अपना “थर्ड ऑय” खोल कर हर मुश्किल को भस्म कर देते हैं और इतना सिंपल सा उपाय बताते हैं की अपने कानों पर भरोसा ही न हो. परेशानी अगर खुद सुन ले, तो शर्मा कर भाग जाये की मियाँ किस इंसान से पाला पर गया, अपनी भी कोई इज्जत है की नही, दिन-दहारे ऐसी बेइज्जती.

अब मै आपको बाबाजी के “कृपा” बरसाने के कुछ किस्से बताता हूँ, ऐसे किस्से तो इतने हैं की आप थक जाओ सुनते-सुनते, लेकिन किस्से ख़त्म नही होंगे, इसलिए आपको 2-3 उदाहरण देता हूँ, जिसके बाद आप बाबाजी के “कृपा” देने के पैटर्न को समझ जायेंगे.

उदाहरण 1:

भक्त: बाबाजी, बहुत मुश्किल में फंसा हूँ, नौकरी नही मिल रही, क्या करूँ?
बाबाजी: समोसा खाते हो?
भक्त: जी बाबाजी.
बाबाजी: हरी चटनी के साथ खाते हो या लाल चटनी के साथ?
भक्त: जी लाल चटनी के साथ बाबाजी.
बाबाजी: जाओ, हरी चटनी के साथ समोसा खाओ, कृपा आनी शुरू हो जाएगी.
भक्त: जी बाबाजी.
(भक्त बेचारा बैठ गया, उसे क्या समझ में आया पता नही, लेकिन मेरी बुद्धि ने तो काम करना बंद कर दिया.)

उदाहरण 2:

भक्त: बाबाजी, मेरा बिज़नेस में घाटा हो रहा है, मै क्या करूँ.
बाबाजी: हनुमान जी को लड्डू चढ़ाव, कृपा आनी शुरू जो जाएगी.
भक्त: जी, चढ़ाता हूँ.
बाबाजी: अच्छा, कौन सी चढाते हो, बेसन के या बूंदी के.
भक्त: जी बूंदी के.
बाबाजी: बस यहीं कर दी न गलती, बेसन के चढ़ाओ, कृपा आनी शुरु हो जाएगी.
भक्त: जी बाबाजी.

उदाहरण 3:

भक्त: बाबाजी…………………………………………………मै क्या करूँ?
बाबाजी: तुम अपनी कमीज़ की बटन कैसे खोलते हो, जल्दी जल्दी या देर से?
भक्त: जी……….मम्म……कभी जल्दी तो कभी देर से भी.
बाबाजी: आराम-आराम से खोला करो, कृपा आनी शुरू हो जाएगी

ऐसे ही कई किस्से हैं, तरीके हैं, जिनसे बाबाजी अपने भक्तों पर “कृपा” बरसाते रहते हैं. अगर सबको लिस्ट करूँ तो शायद रामायण, महाभारत से भी बड़ा कोई महामहाकाव्य बन जायेगा. लेकिन न आपके पास उतना वक़्त है सुनने का, और न ही मेरे पास सुनाने का. इतने किस्से सुनकर आपको पता तो लग ही गया होगा की मै किस बाबाजी की बात कर रहा हूँ. लेकिन यहाँ महत्वपूर्ण, बाबाजी का नाम जानना नही है, उससे ज्यादा महत्वपूर्ण है ऐसे भक्तों का नाम जानना जो 4000 से 5000 रुपैये का टिकट ले कर ऐसी-ऐसी सलाह लेते हैं और ख़ुशी-ख़ुशी घर भी लौट जाते हैं. ऐसे भक्तों का जो बाबाजी के अकाउंट में डायरेक्ट मनी भी ट्रान्सफर करते हैं. और इन भक्तों में काफी संख्या में पढ़े-लिखे लोग भी होते हैं. बाबाजी का तो अब तक स्विट्ज़रलैंड में बैंक अकाउंट खुल गया होगा और लन्दन जैसे बड़े शहरों में 10-20 फ्लैट भी बुक हो गए होंगे, लेकिन इन भक्तों को कृपा के नाम पर आखिर क्या मिला? समोसे की हरी चटनी और बेसन के लड्डू? वाह रे ऊपर वाले, तेरी “कृपा” भी निराली है.